"बड़गूजर सूर्यवंशी क्षत्रिय। इनका गौत्र वशिष्ठ तथा प्रवर वशिष्ठ, अत्रि और सांकृति है। वेद यजुर्वेद, शाखा - वाजसनयी, सूत्र - पारस्कर, गृह्यसूत्र, कुलदेवी - कालिकाजी और ईष्टदेव लक्ष्मण जी है। इस वंश के लोग आजकल अपने आपको राघव लिखते हैं। ज्यादातर इतिहास लेखक इनका निकास सूर्यवंशी रामचंद्र जी के पुत्र लव से मानते है। बड़गूजर राजवंश नामक पुस्तक के लेखक महेंद्र सिंह तलवाना अपनी किताब में लिखते हैं कि बड़गूजर क्षत्रियों की उत्पत्ति को लेकर दो मत प्रचलित है एक मत इन्हें लव से जोड़ता है तो दूसरा लक्ष्मण जी से। महेंद्र सिंह जी ने अपनी किताब में इन दोनों मतों पर विस्तार से विश्लेषण किया है। उनके अनुसार बड़वों की पोथियों में बड़गूजरों को लव से जोड़ा गया है पर उनकी वंशावलियाँ कुश के वंशजों से मिलती है। इस तरह भ्रम की स्थिति बनती है।
राजपूत शाखाओं का इतिहास पुस्तक में देवी सिंह मंडावा बड़गूजरों को लव के वंशज मानते हैं और लिखते हैं कि ढूंढाड़ प्रदेश के शासक थे। राजौर (अलवर) तथा दौसा इनकी राजधानियां थी। देवीसिंह जी बड़गूजरों को मेवाड़ के गुहिल वंश से भी जोड़ते हैं वे लिखते हैं कि राजा गुहिल के वंशजों में एक सन 593 ई के लगभग राजौरगढ़ को अपनी राजधानी बनाकर रहने लगा। उसके पूर्वज गुजरात से आये थे, इसलिए उसके वंशज बड़गूजर कहलाये तथा राजौर में बसने के कारण राजौरा कहलाये और रघुवंशी होने के कारण अपने नाम के आगे राघव लिखने लगे।
राजौर के बड़गूजरों की शाखाएं देवती, मांचेड़ी, दौसा, तीतरवाड़, कोलासर, शंकरगढ़, भानगढ़ और सीकरी तक फैली हुई थी। जहाँ इनके छोटे छोटे राज्य कायम हो गए थे। उस समय उत्तर भारत पर सम्राट हर्षवर्धन का राज्य था। बड़गूजर राजवंश नामक पुस्तक के लेखक महेंद्र सिंह तलवाना के अनुसार खुम्माण रासौ में बड़गुजरों के लिए प्रतिहार शब्द का इस्तेमाल किया है। देवीसिंह जी ने भी राजौरगढ़ के वि. स. 1016 के शिलालेख के मथन देव को बड़गूजर माना है, जिसके लिए उक्त शिलालेख में प्रतिहार कुल का होना स्पष्ट लिखा है। इतिहासकार रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी ने भी क्षत्रिय राजवंश नामक पुस्तक में राजौरगढ़ शिलालेख के आधार पर बड़गूजरों को प्रतिहार वंश की शाखा माना है। इस तरह बड़वों की पोथियों को माने तो बड़गूजर राजवंश लव के वंशज है और शिलालेखों को माने तो वे प्रतिहार वंश की शाखा है इसलिए लक्ष्मण जी के वंशज है।
जैसा कि हमने पहले कहा "बड़गूजर राजवंश" नामक पुस्तक के लेखक महेंद्र सिंह तलवाना ने बड़वों की पोथियों सहित सभी लेखकों के मतों का गहन अध्ययन किया है और विश्लेषण के बाद उन्होंने लिखा है कि - बड़गूजर भगवान राम के अनुज लक्ष्मण जी के वंशधर है, इस निष्कर्ष पर पहुँचने में हमें किसी प्रकार का संशय नहीं है।"
अब जानते हैं बड़गुजरों की खाँप के बारे में - राजौरा, सिकरवार, मडाढ़, खाण्डावत ( खण्डोड़ा), मूँजवाल ( भरतपुर में ), रायजादा, बुधवार, पोकरणा, कन्नौजिया, मलहजनी, कलहंस, मद, सिंध, सोन्धिया, इंदा, गजकेशर, जेठवा, भूतहा, माहप, डूराणां, गोढ़ला, टाकसिया, घनेरिया, चेनिया, बोजरा, चोहिल, देवल, थांथिया, बूलणा, रामवटा, बजोधा, बारी, बाफना (बणिये हैं), चोपड़ा (बणिये हैं), पेसवाल (रैहवारी हैं) आदि।
वंश : सूर्यवंश, रघुवंश, इक्ष्वाकु वंश,
कुल : बड़गूजर ( पूर्व में प्रतिहार, गुर्जर-प्रतिहार)
कुलदेवता : नीलकण्ठ महादेव, राजौरगढ़ (अलवर) पूर्व में विष्णु भगवान
कुलदेवी : आशावरी माताजी, राजौरगढ़ ( पहले चामुण्डा व क्षेमकरी) जोधपुर व जालौर, भीनमाल, हिमाचल प्रदेश आदि में
ईष्टदेव : भगवान राम ( पूर्व में विष्णु भगवान )
गौत्र : कश्यप व भारद्वाज ( हरियाणा में )
प्रवर : तीन - ककुत्स्थ, इक्ष्वाकु, रघु । सूर्यवंश में ये तीनों सर्वश्रेष्ठ पुरुष हुए हैं। क्षत्रिय इन तीनों के नाम के तीन धागे (जनेऊ) धारण करते थे। ब्राह्मण सात धागे धारण करते हैं।
शाखा : माध्यन्दिनी, वेद- यजुर्वेद नगारा- रणजीत, नदी- सरयू, बाद में सरस्वती, वृक्ष- पीपल व सैंहता (मध्यप्रदेश में), तम्बू- पटागर
बैठक : अयोघना, घोड़ा - श्यामकर्ण, तलवार ( खाण्डा) - सकेला
सूत्र : पारस्कर गृहसूत्र, तीर्थ- पुष्कर जी,
मंत्र : सूर्यमंत्र (गायत्री मंत्र ), निशान (झण्डा) - लाल (सूर्य चिह्न युक्त), बाद में पंचरंगा
पक्षी : गरुड़
गद्दी : अयोध्या, कारापथ, लाहौर, भीनमाल, मण्डोर, राजौरगढ़ आदि
अभिवादन- जय रघुनाथजी की
